आईबीएन-लोकमत चैनल के मुबंई दफ्तर पर शिवसैनिकों के हमले के विरोध का स्वर बेहद दबा नजर आया। शिव सैनिकों के कुछ वर्ष पूर्व के मीडिया पर हमलों के विरोध को याद करें तो उसकी तुलना में तो इस बार का विरोध महज औपचारिक विरोध के रूप में सामने आया। मुझे याद है कि 1990 के शुरूआती दिनों में हमने दिल्ली में सांसदों के रहने की जगह पर शिव सेना संसदीय दल के नेता के घर का घेराव किया था। इस बार के फीके विरोध के कारणों की तलाश हमें करनी चाहिए।
पहली बात तो ये देखी गई कि मुंबई में टीवी चैनल पर हमले के बाद दूसरे दिन के समाचार पत्रों में शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे की तस्वीर छपी थी और उसके साथ उनका राम मंदिर बनाने का संकल्प प्रकाशित किया गया था। इस संकल्प को बहुत प्रमुखता से छापा गया। संभव है कि ये संकल्प बहुत सारे समाचार पत्रों में नहीं छपा हो लेकिन ये तो तय है कि बहुत सारे समाचार पत्रों में इस हमले का विरोध प्रमुखता से सामने नहीं आया।
क्या हम ये मानें कि मीडिया में एक ऐसी प्रतिस्पर्द्धा शीर्ष पर है जिसके सामने लोकतांत्रिक चेतना और संवैधानिक सिद्धांतों पर हमलों से जुड़े सवाल भी गौण हो गए हैं? क्या ये माना जाने लगा है कि इस तरह के हमलों से किसी संस्थान का ऐसा विज्ञापन हो जाता है जो अंतत उनके खुद के व्यवसायी घाटे और प्रतिस्पर्द्धी संस्थान के व्यवसायी फायदे के रूप में परिवर्तित हो जाता है? क्या ये माना जाए कि मीडिया में साम्प्रदायिकता के सवाल पर एक स्पष्ट विभाजन रेखा खिंच चुकी है? सभी संस्थानों ने ये स्पष्ट कर दिया है कि वे साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ हर स्तर पर हैं अथवा नहीं हैं?
आईबीएन-लोकमत पर हमलों के बाद जिन संस्थानों के उत्पादों( माध्यमों) में हमले की तीखी या हल्की भर्त्सना के बजाय शिव सैनिकों को महिमा मंडित किया गया, कम से उनकी तो इस संदर्भ में बात स्पष्ट होती है? तो क्या मीडिया का इस कदर साम्प्रदायीकरण स्थापित हो चुका है कि लोक लाज की भी परवाह नहीं है?
दरअसल, मीडिया पर हुए इस हमले ने कई ऐसे सवाल खड़े किए हैं। इससे यह तय होता दिखाई दे रहा है कि भविष्य में मीडिया और लोकतंत्र के रिश्ते कैसे होंगे। सवाल उनसे भी किया जा सकता है जो हमले के शिकार हुए हैं। आखिर क्या कारण है कि शिव सैनिकों के हमले का तो विरोध करना वे जरूरी समझते हैं लेकिन शिव सैनिकों जैसी उद्दंड राजनीतिक शक्तियों को बेवजह महत्व देने से बाज नहीं आते रहे हैं। कई बार देखा जाता है कि शिव सैनिकों की कुछ भी सामग्री को उसके मुखपत्र से लेकर प्रकाशित या प्रसारित की जाती रही है। यदि शिव सैनिक की जगह पर कोई ऐसी राजनीतिक शक्ति हो जो कि देश के गरीब गुरबों की पक्षधर हो और वह तथ्यात्मक स्तर पर दुरूस्ती के साथ बड़े महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है, तो क्या उसकी सामग्री को उसी प्रमुखता से छापने की व्याकुलता दिखाई देती है? स्पष्ट जवाब है कि बिल्कुल नहीं। बल्कि ये कहा जाता है कि इस तरह की खबरों की कोई जगह नहीं है।
शिव सैनिकों का मुबंई और उसके आसपास के इलाकों में जनाधार रहा है क्या उस जनाधार में अपनी मार्केटिंग के लिए इस तरह से सामग्री प्रकाशित प्रसारित करने की बेचैनी होती है? शायद इसका भी स्पष्ट जवाब ये नहीं दिया जा सकता है कि नहीं ऐसा नहीं है। यदि शिवसेना का प्रभाव सीमित क्षेत्र में है तो उसे एक राष्ट्रीय महत्व के रूप में क्यों स्थान दिया जाता रहा है? क्या मुबंई की वजह से? इसका भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा सकता है। उसके हिन्दुत्व की मार्केटिंग पूरे देश में की जा सकती है इसीलिए उसे ये महत्व दिया जाता रहा है। लेकिन मार्केटिंग तो अपने राजनैतिक पूर्वाग्रहों को वैधता प्रदान करने का एक बहाना है। लोकतंत्र में मार्केटिंग के लिए क्या कुछ भी किया जा सकता है? नहीं किया जा सकता है सिद्धांत रूप में तो ये कहना आसान है लेकिन व्यवहार में देखा जाए तो इसका पालन कितना होता है?
शिव सैनिक फासीवादी राजनीतिक विचारधारा के संगठन के दस्ते के सदस्य हैं। उनके राजनीतिक विचारधारा के विस्तार की गुंजाइश तैयार करना फासीवाद के पक्ष में ही खड़ा होना होता है और फिर उसके विस्तार के साथ लोकतंत्र का अंत मान लिया जाना चाहिए। ऐसा संभव नहीं है कि फासीवादी विचारधारा के विस्तार के बाद मीडिया खुद को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में खड़ा रहने की आवाज लगा सकता है। साम्प्रदायिकता का विस्तार मीडिया और जिस लोकतंत्र के सहारे वह खड़ा है, उसके अंत की घोषणा के करीब पहुंचने का अप्रत्यक्ष उपक्रम है। मुंबई के हमले पर जितना शोर मचाना चाहिए था वह नहीं मचा तो ये इससे बड़े हमले की पृष्ठभूमि में शामिल होने की स्वीकृति देने जैसा है।
मीडिया और तमाम लोकतंत्र प्रेमियों को कम से कम ये समझौता करना चाहिए कि इस तरह के हमले किसी पर हो उसका सब मिलजुल कर विरोध करेंगे। ऐसी शक्तियों के विस्तार की गुंजाइश को यथासंभव कम किया जाएगा। मीडिया का हिन्दुत्ववादी या इस्लामिक कट्टरपंथी होना लोकतंत्र और संविधान के बने रहने की बुनियादी शर्त पर हमला होता है।
- अनिल चमडिया